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An Indian Army Officer retired

Tuesday, March 31, 2015

उसका बचपना नहीं जाता.....!




उसका बचपना नहीं जाता
उस से रहा ही नहीं जाता
वो जिद से उलझी - सुलझी रहती है
वो बिना बात मचलती है
मेरे उसके इस रिश्ते के लिए
उसका यूंही बच्चा बना रहना ही ठीक है शायद
“क्योंकि बड़ों के बीच रिश्ते अकसर, बहुत छोटे होते हैं..”

© 2010 Capt. Semant

Monday, September 9, 2013

केसरिया शाम............!

















बस यूं ही....

कुछ पल ख्वाब के साथ गुज़रे.... 


और ज़िंदगी जी ली मैंने...

देखता ही रहा उसे, मेरे पास होने तक, साथ होने तक, और फिर,

बस देखता रह गया, ‘उसे’, उसके भीड़ में गुम हो जाने तक... 

जैसे गुम होता डूबता सूरज... 

लिपटी रह गयी फिर मुझसे,

केसरिया शाम, उसके केसरी दुप्पटे सी......


© Capt. Semant 2013

Monday, February 18, 2013


हर बार दीवारें सिर्फ इसलिए ही ना चुनी थी कि किसी से फांसला करना था,
कई बार ये भी चाहा कि देखूँ इन्हें गिराता भी है क्या कोई.... ~सेमन्त~

Tuesday, January 29, 2013

प्रीत कभी मरती नहीं...

मुझे मालूम है और तुम भी जान गए हो, कि,
प्रीत कभी मरती नहीं...
बस मुरझा जाती है,
बसंत के बाद फूल झडे पेड़ों को पानी पिलाना भूले - तुम भी , मैं भी,
फिर ये भूलने की भूल स्वीकार भी नहीं कर पाए - तुम भी , मैं भी....
अब तुम मान जाओ तो , हम मिलकर ,
चलो एक बार फिर,
अपने आँगन के बगीचे में जाते हैं ,
क्यारियों में गिरी गुलाबों की हर पंखुड़ी चुन ले आते हैं,
फिर से घर महकाते हैं.......

बस यूं ही....एक बात कहनी थी तुमसे,
मैंने कल रात भर ,
रात !
तुम्हारा हाथ अपने हाथ में ले गुजारी है....
अपने ख्वाब में..... !
© 2013 Capt. Semant

Monday, January 28, 2013

वक्त........!

वक्त !
ये हर बार तुमसे एक ही लडाई ,

तुम्हें मानूं या अपनी सुनूं ,

तुम्हारी अंगुली पकडूँ, साथ चलूँ,
या,
अपना रास्ता चुनूं....

इस उधेड़ बुन में बस यूं ही खड़ा रह गया हूँ , 
अपने स्वप्नगृह के कच्चे आँगन में...दीवारें छोटी हो या बड़ी, दीवार ही होती हैं...

पर स्वप्न बालक से...
रोज़ इस पार उस पार कूदने का खेल खेल लेते हैं,

और, मैं ! 
दरवाज़े से तुम्हें रोज़ बस यूं ही ताकता रह गया हूँ,
पक्की सडक वाली गली से होकर गुजरते, जाते हुए...

न तुम ही कभी रुके,
न मैं ही कभी चल पाया, इतने लम्बे कदम, जितने तुम्हारे..!

© 2012 Capt. Semant

कल रात.........


कल रात अपनी ‘तन्हाई’ से ये कहना भूल गया कि,
मैं अकेला हूँ,

बस ये बात छुपी नहीं और तुम्हारी यादों ने घेर लिया,
रात भर उन दो पलों की मुलाकातों के ढेर सारे फूल पिरोते रहे,
मैं और तुम्हारी याद,

फिर बिखर गया चांदनी की चादर पर स्वप्न का सिन्दूर....

बस यूं ही,
फिर एक बार, बिखर गया चांदनी की चादर पर स्वप्न का सिन्दूर....
और ! ये बात मैंने मान ली,
कि यादें !
तुम्हारे, मेरे और गुज़रे पलों के बीच एक पगडंडी हैं.....

© 2012 Capt. Semant