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An Indian Army Officer retired

Tuesday, August 30, 2011

इस मन की बंजर खेती को एक बारिश का इन्तेज़ार......

अपनी उम्मीदों की धरती
अपनी आशाओं का आकाश ...
हर मौसम में अब इस मन की बंजर खेती को एक बारिश का इन्तेज़ार रहता है,
ये नीला अम्बर अब हर प्रहर तुम्हारे रंग भरता है,
इन्द्रधनुष के... चांदनी के... अमावस के ...
कभी प्यास तुम मुझही को लगते हो,
कभी मैं तुम्हें पीकर प्यासी होने लगती हूँ,
अब तो ये शाश्वत है कि, लौटा नहीं सकते तुम मुझे,
मेरे हिस्से की ज़मीं, मेरा आकाश
क्योंकि अब मैं नहीं हूँ मैं ...
मैं तो हो गयी हूँ तुम,
सच एक बार फिर कहो,
और बार बार कहो कि,
"तुम हरदम मेरे मन के कच्चे आँगन की खुशबू बनकर रहोगे..."


Wednesday, August 24, 2011

अग्नि परीक्षा.....


तुम्हें लगता है मेरा झूठ सच्चा है,
मुझे लगता है तुम्हारा, मेरे सच पर शक करना झूठा है,
क्या यूं ही जीवन बीतेगा,
अग्नि परीक्षा देते हुए,
इस व्यथा कथा में सीता का पात्र यदि मेरा,
तो तुम राम क्यों नहींअश्वमेघ की वेदी पर तुम "अकेले" क्यों नहीं,
मेरी मृत संवेदनहीन स्वर्ण मंडित प्रतिमा से किस छल को सत्य सिद्ध करना चाहते हो,
मेरे वेदना से पीले चेहरे पर हरदम घुटी घुटी हँसी का निर्णय तुम्हारा क्यों,
मैं क्यों सदा सिर्फ कृत्रिम शृंगार करूँ,
मेरा ह्रदय स्वतंत्र क्यों नहीं,
संवेदना तुम्हारी मेरी वेदना का मरहम क्यों नहीं... 

Tuesday, August 23, 2011

स्वप्न को कोई कब छीन पाया है....

बस इतना कहना चाहता हूँ

कि क्या तुम इतना भी नहीं जानते
कि बिना भाव के शब्द
खोखले होते हैं ....
उनके आरपार देखा जा सकता है
इतना आरपार कि फिर कहनेवाले को
आजमाने की जरूरत भी नहीं रहती..
मैं भी तुम्हें अब शायद न आजमाऊं...
कुछ खोखली हो चुकी है,
तुम्हारे शब्दों की किताब...
तभी तो मैंने कुछ पन्नों में जो,
गुलाब दबा रखे थे, वो गिरे पाए फर्श पर....
मैं तब भी तुम्हारे स्वप्न की खुशबू से महकता था,
मैं अब भी उसी खुशबू से महकता रहूँगा,
खुला आकाश रेत से मिलने झुकता रहेगा,
हवा रेत पर लिखे पैरों के निशान मिटाती रहेगी,
वो खुले काले बादल फिर लौटेंगे,
इस बार सिर्फ मेरे गाँव को भिगोने,
किताबों से गिरे गुलाब के फूलों की पंखुडियां,
फिर से हो जायेंगी, भीनी भीनी...
इन मौसमों ने हर बार लौट कर
मेरे विश्वास का हाथ थामा है...
स्वप्न को कोई कब छीन पाया है....

Friday, August 19, 2011

रेत की डगर


पगली सी,
अपने चेहरे पर खींची लकीरों को, हवाओं से संवारती है,
चूमती है पवन को और,
लहर लहर बलखाती है,
ये रेत की डगर है, 
मेरे गांव से तेरे शहर तक,
बार बार जाती है 
मिट जाती है...

Wednesday, August 17, 2011


उसकी सुराही सी प्यारी गोद में दोपहर का ताप मिट जाता है 
अतीत का धुँधलापन,उजियारा बन जाता है,
भूत-वर्तमान का भेद मिट जाता है,
मैं सिर्फ स्वप्न में खो जाता हूँ 
माँ जब जब तेरा आँचल पाता हूँ 
फैला हुआ मेरे आँगन में..... 

Tuesday, August 16, 2011


वो आंसुओं से बड़ा परहेज़ रखता है 
गहरा समंदर है आँखों  में किताब रखता है...

Saturday, August 13, 2011

विश्वास में प्रतिशत नहीं होता....


हमारी मित्रता तो यथार्थ के धरातल पर टिकी है,
वास्तविकता के आधार पर नींव उसकी टिकी है,
फिर प्यार सिर्फ प्यार है,
प्यार में दिखावा कैसा....
प्यार मतलब सिर्फ "विश्वास"
और विश्वास में प्रतिशत नहीं होता,
वो या है या नहीं है होता,
प्रेम मूक अभिव्यक्ति है,
बिन शब्दों के भी कानों में घुलता है,
मन को छूता है,
भौतिक प्रेम हमेशा खोने का डर ढोता है,
आत्मिक प्रेम अमर होता है,
वो शारीरिक स्पर्श नहीं,
आत्मा की अनुभूति होता है,
इसलिए उसमे आत्मविश्वास होता है,
उसके दोनों और के पात्रों की आत्मा एक दूसरे पर विश्वास करती हैं,
और जन्मजन्मांतर के बंधन में बंध जाती है,
इसलिए खोने का डर नहीं होता,
बिना मिले भी,
बिना छुए भी,
बिना खोखला अधिकार लिए,
वो अपने सत्य को पहचानता है,
दृढ़ रहता है,
बिखरता नहीं,
प्रेम का पहला कदम ही यदि "रूप-स्वरूप" हो तो हरदम संशय रहता है,
यदि पहली सीढ़ी "मन" से जुडी हो तो,
रोज मिलने की इच्छा नहीं होती लालच नहीं होता,
"वक्ते ज़रूरत सिर्फ उसका नाम मन में उमड़े,
जब दिल घबराये उसका कंधा साथ लगे,
जब अकेले हों उसके सपनों की आहट संगीत सी आसपास चले
जब कभी भी सफर में हों उसका हाथ हाथ में लगे,
हरदम ये सच कायम रहे कि
तुम कही ठोकर खाओ तो वो कहीं भी हो जान जाये....."

चलो, मुझे ये बहुत अच्छा लगा कि मैंने कहा और तुमने मान लिया
इस मेरे समझाए सत्य को जान लिया,
कि "अनुभूतियों का, भावनाओं का अपना मोल है,
यह खोखले अधिकारों का पिंजरा है उसमें भी कोई खुशी और प्रेम का कोना है, जो तुम्हें ढूँढना है,
मेरे और तुम्हारे जैसे इंसानों में
अंतर्यामी होने का गुण बसा लगता है...
क्योंकि तुम हरदम यूं लगती हो जैसे मुझे पूर्णता से जानती हो,
मुझे यूं भी लगता है कि मैं तुम्हें पूर्णता से जानता हूँ...
प्रीत पाश नहीं...
प्रीत विश्वास है.....

Friday, August 12, 2011

वो बन के धुआं घेर न पाती मुझको...


वो बन के धुआं घेर न पाती मुझको
वो बादल में छुपे चाँद सी नजर न आती मुझको
कई बार लगता है कि वो है ही नहीं
कई बार लगता है कि मैं हूँ ही नहीं....
उसके घने स्याह बालों में छुपा मैं
मुझमे छुपी वो...
ये वक्त और वजह की पगडंडियाँ न जाने कैसे किसी बड़ी सड़क से दूर निकल जाती हैं ....
छोटे से घरोंदे तक...
उसके घेरे में उठे धुएं के पार..
हर शाम से अगली सुबह तक...

Wednesday, August 10, 2011

सुना है किसी से प्यार करती है.......



एक सांवली सी लड़की,
रोज मेरी गली से चहकती सी गुजरती है,
सुना है किसी से प्यार करती है,
उसीसे रोज मिलने जाती है,
वो शाम से कुछ पहले आती है, और कुछ बाद जाती है,
पता नहीं क्या है कि, उस के बारे में सोचता रहता हूँ,
मेरा अनजान सा रिश्ता हो गया है,
न आये तो सुबह सुनहली नहीं होती, शाम सजीली नहीं होती
जुही की डाली सी इठलाती,
मेरे दालान को महकाती,
एक सांवली सी लड़की,
रोज मेरी गली से चहकती सी गुजरती है,
सुना है किसी से प्यार करती है,
उसीसे रोज मिलने जाती है,
एक सोच उसका अब हरदम, मेरी सोच पर दिन भर छाया रहता है, 
मेरा अपना मन, मन ही मन खुद शरमाया रहता है ,
अपने बालों को घुमाती, अपने ही होठों में दबाती,
तेज तेज चलती, अपने आप से बातें करती,
एक सांवली सी लड़की,
रोज मेरी गली से चहकती सी गुजरती है,
सुना है किसी से प्यार करती है
उसीसे रोज मिलने जाती है,
अब उसका रोज मेरे पास से गुज़रना मेरी आदत हो गया है
चौखट पर इन्तेज़ार करते रहना मेरी आदत हो गया है,
एक आदत सी हो गयी है वो,
और ये आदत छोड़ी नहीं जाती,
एक सांवली सी लड़की,
रोज मेरी गली से चहकती सी गुजरती है,
सुना है किसी से प्यार करती है
उसीसे रोज मिलने जाती है,
दुआ करता हूँ,
उसका प्यार बना रहे,
वो रोज ऐसे ही हँसती,
बाल घुमाती....
मेरे दालान को महकाती....
उस लड़के से मिलती रहे,
उसका उस लड़के से प्यार बना रहे,
मेरे दालान में उसकी खुशबू अपने आप फ़ैल जायेगी...

Monday, August 8, 2011

"परिणीता"

संबंध” 
का मतलब सम बंध है तो
ये हम दोनो के बीच बराबरी की प्रीत क्यों नहीं
मेरा मन बार बार क्यों ये कहता है कि यह सिर्फ एक बंधन है 
"सम-बंध" नहीं...
मैं ये मानती हूँ कि प्यार को अधिकार कहना ठीक नहीं
प्यार उन्मुक्त अभिव्यक्ति है,
ऐसा नहीं कि तुम ये नहीं समझते, पर इन दिनों हरदम तुम्हारा अपने आप पर, मुझ पर, अपने रिश्ते पर विश्वास, हिला हुआ सा देखती हूँ,
ये कोई वजह है या वहम ,
या तुम्हरा अपना खोखला खालीपन जो तुम्हें डंसता है,
एक बार खुल कर क्यों नहीं कह देते,
ये तिल तिल टूटना मुझे भी अच्छा नहीं लगता 
पुतलियों की प्रीत कठपुतलीवाले की अंगुली पर नाचती है 
लोगों की, तुम्हारी, खुशियों के लिए हर बार मैं ही मैं कठपुतली बनी रहूँ ये अब नहीं होता,
तुम ईश्वर नहीं ठीक... पर मैं तो इंसान हूँ....

मेरे मन पर इतिहास ने ये हरदम साबित किया है,
कि जिसका प्यार कम होता है , रिश्ते पर उसकी पकड़ ज्यादा होती है..
वो जैसे चाहे जब चाहे अपने मन की करवा लेता है प्यार की दुहाई दे कर ,
क्योंकि कम चाहने वाला जानता है दूजे की कमज़ोर नब्ज़
मौन मेरा ही क्यों होता है हमेशा नम मेरी आँखों में...  
तुम कब मौन हुए मेरी आँखों में नमी के लिए, ये याद करती हूँ तो वो क्षण संदल से पलकों की कोर पर महक जाते हैं,
जब संबंध से पहले
तुम भी प्रीत में बराबरी से झुकते थे....

Wednesday, August 3, 2011

“मैं सांवली हूँ न इस लिए अँधेरा है मेरे चारों ओर चेहरे पर...”


उसने आज बात करते हुए कहा मैं सांवली हूँ न इस लिए अँधेरा है मेरे चारों ओर चेहरे पर...
इस घने अँधेरे में उसके हाथों की लाख की  चूडियों के कुछ सितारे चमकते हैं और रोशन हो  जाती है उसके चेहरे पर एक मृत अभिलाषा ...
यौवन की उमंगों के घुट जाने को वो नाहक साथ लिए चलती है...
वो सोने की गुडिया शायद नहीं जानती ताप से ही कनक निखरता है,
लाख की चूडियों की खनक सुरीली नहीं होती,
चूडियाँ कांच की इतनी सख्त नहीं होतीं,
कमी किसमे नहीं होती...
उसने आज बात करते हुए कहा मैं सांवली हूँ न इस लिए अँधेरा है मेरे चारों ओर चेहरे पर...
उसने तितलियों का अहसास छोड़ दिया दिया है,
अपने पुराने रंग बिरंगे अनोखे परिधानों को वक्त के बक्सों में बंद कर लिया है
वो तितलियों की शहजादी शायद नहीं जानती कि फूल अभी भी खिलते हैं,
खिड़कियाँ बंद कर लेने से मौसम नहीं बदलते,
बारिश सब कुछ  धो देती, निर्मल कर देती ,
पर फिर भी कहीं कीचड़ से धरती सनी होती,
कमी किसमे नहीं होती,
उसने आज बात करते हुए कहा मैं सांवली हूँ न इस लिए अँधेरा है मेरे चारों ओर चेहरे पर...

उसको वक्त के एकांत ने घेरा है
तभी तो उसके चेहरे पर एक और चेहरा है,
धूप ने उसे हर बार छला है,
उसका चेहरा बारिशों के मौसम में गला है,
वो गहरी झील ये नहीं जानती कि झरनों के साथ बहते अनगढ़ पत्थर एक दिन शिव बन जाते हैं,
खुद सिमट जाने से दायरे कम नहीं हो जाते,
चाँद और सूरज अक्सर चमकने के पर्याय माने  जाते,
पर फिर भी ग्रहण की बातें उनके लिए भी हैं होती,
कमी किसमें नहीं होती,
उसने आज बात करते हुए कहा मैं सांवली हूँ न इस लिए अँधेरा है मेरे चारों ओर चेहरे पर...

न जाने क्यों फिर भी वो हर वक्त , वक्त आने की बात करता है...


वो बार बार ज़माने की दुहाई देता है,
कुछ  तो है जो, उसे पिंजरे में जकड़ता है,
वो नहीं मानता कि  ज़िंदगी बहुत बड़ी नहीं, छोटी है,
वो हर वक्त, वक्त के आने की बात करता है,
वो समझे तो उससे कहूँ, कि चांदनी के सपने रात खत्म हो जाने से पहले ज़मीन पर उतार लो ,
सुबह की लालिमा के बाद धूप बहुत झुलसाती है ...
ढलती शाम सपने, चाँद का हाथ पकड़ कर ही बुन सकती  है
सूरज की रोशनी में सपने सब को दिखाई दे जाते हैं
हर नज़र कुछ न कुछ जान जाती है,
मन परिंदा है धूप में उड़ा तो थक जायेगा,
या किसी के शब्द बाण से बिंध कर मर जायेगा,
चैन सिर्फ हरी शाख के घरोंदे में पायेगा, 
घरोंदे शाम का ईमानदारी  से इन्तेज़ार करते हैं,
पिंजरे कब खुली हवा के मायने समझते हैं 
बंद पिंजरों में सपने कभी नहीं खिलते हैं,
पिंजरों में सिर्फ बंधन पलते हैं,
मालिकाना गर्व सजते हैं,
सुन्दर पिंजरे का मालिक परिंदे का भी मालिक है,
और ये रिश्ता तब तक ही रहता है जब तक परिंदा अपने ख्वाब नहीं बुनता है,  
ये बात शायद वो नहीं समझ पायेगा,
वो वक्त आने का इन्तेज़ार करता रह जायेगा
वक्त रेत है अँगुलियों के बीच से चुपके से सरक जायेगा.....
पिंजरा खुल भी गया तो उस रोज परिंदा उड़ नहीं पायेगा...
और उड़ा भी तो उस वक्त कहाँ जायेगा,
क्योंकि तब तक हरी शाख का खाली घरोंदा पतझड़ आने पर तिनका तिनका बिखर जायेगा ...

न जाने क्यों फिर भी वो हर वक्त , वक्त आने की बात करता है...
न जाने क्यों नहीं मानता कि  ज़िंदगी बहुत बड़ी नहीं, छोटी है....


Monday, August 1, 2011

ये ऐसा क्यों कि कुछ भी पूरा नहीं लगता..


किसी एक रोज़ शाम के धुंधलके से होकर,
तेरा हाथ थामें यूं ही रात में उतरूं ...
छान रही हो चांदनी तेरा मुझमें समाये होने का हर अहसास, मेरे ही आँगन के नीम से,
और हरसिंगार झड़ता रहे...
इस रात चौखट खुली रहे
मैं निडर हो आसमान में एक गीत उछाल दूं
लिख दूं नीली आसमानी छत पर
"मुझे अब बिन तुम्हारे कुछ अच्छा नहीं लगता..."
ये ऐसा अचानक ऐसा क्यों,
कि अपने आपको ही अधूरी लगती हूँ..
ये ऐसा क्यों,
कि कुछ भी पूरा नहीं लगता..